राजीव गांधी वन संवर्धन योजना- हिमाचल की हरियाली, रोजगार और जनभागीदारी का नया मॉडल
हिमाचल प्रदेश की पहचान उसके पहाड़ों से है, लेकिन इन पहाड़ों की असली ताकत उनके जंगल हैं। जंगल केवल हरियाली नहीं देते—वे पानी को रोकते हैं, मिट्टी को थामते हैं, जैव विविधता को बचाते हैं और गांवों की अर्थव्यवस्था को जीवन देते हैं। ऐसे समय में जब जलवायु परिवर्तन, जंगलों की आग, भूस्खलन और अनियमित वर्षा हिमाचल के सामने लगातार नई चुनौतियां खड़ी कर रही हैं, वन संरक्षण को केवल सरकारी जिम्मेदारी मानना पर्याप्त नहीं है। यही सोच राजीव गांधी वन संवर्धन योजना को एक अलग पहचान देती है। इस योजना को समझने के लिए ‘पौधरोपण’ शब्द से थोड़ा आगे जाना होगा। क्योंकि एक पौधा लगाना आसान है, लेकिन उसे वर्षों तक जीवित रखना असली चुनौती है। योजना इसी चुनौती को ध्यान में रखते हुए समुदाय को पौधरोपण के साथ-साथ उसके रखरखाव की जिम्मेदारी देती है। चयनित सामुदायिक संगठनों को बंजर या क्षतिग्रस्त वन क्षेत्रों में पौधरोपण के लिए भूमि उपलब्ध कराई जाती है और पौधों की देखभाल की जिम्मेदारी भी उन्हीं की होती है। सरकार ने इस योजना के लिए 100 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है। प्रत्येक सामुदायिक संगठन को अधिकतम पांच हेक्टेयर तक उपयुक्त वन भूमि दी जा सकती है। पौधरोपण के लिए वित्तीय सहायता के साथ-साथ पौधों के जीवित रहने की दर के आधार पर प्रदर्शन आधारित प्रोत्साहन का भी प्रावधान किया गया है। यानी अब सवाल केवल यह नहीं है कि कितने पौधे लगाए गए, बल्कि यह भी है कि कितने पौधे बचे। यही इस योजना की सबसे बड़ी खूबी है। मुख्यमंत्री ने 2 जून 2025 को हमीरपुर से इस योजना का शुभारंभ किया। योजना का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इसमें जंगल लगाने की जिम्मेदारी केवल विभाग तक सीमित नहीं रखी गई, बल्कि महिला मंडलों, युवक मंडलों, स्वयं सहायता समूहों और अन्य सामुदायिक संगठनों को सीधे भागीदार बनाया गया। हिमाचल के गांवों में महिलाएं जंगलों से सबसे अधिक जुड़ी रही हैं। ईंधन, चारा और पानी से लेकर ग्रामीण जीवन की अनेक आवश्यकताएं प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से वन संसाधनों पर निर्भर रही हैं। ऐसे में महिला मंडलों को वन संरक्षण की जिम्मेदारी देना केवल पर्यावरणीय पहल नहीं, बल्कि सामाजिक भागीदारी का भी महत्वपूर्ण उदाहरण है। योजना के शुभारंभ के अवसर पर हमीरपुर के नादौन क्षेत्र के अमलेहड़ और भवड़ां महिला मंडलों को प्रमाण-पत्र सौंपे गए। दोनों महिला मंडलों को दो हेक्टेयर वन भूमि पर पौधरोपण और पांच वर्षों तक उसके रखरखाव की जिम्मेदारी दी गई। जिस महिला ने कभी जंगल से लकड़ी और चारा लाने के लिए रास्ते तय किए थे, वही अब जंगल बचाने की जिम्मेदारी निभा रही है। योजना का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष है—पर्यावरण और रोजगार को एक-दूसरे का विकल्प नहीं, बल्कि सहयोगी बनाना। ग्रामीण क्षेत्रों में युवाओं के लिए रोजगार के अवसर सीमित हैं। ऐसे में वन संरक्षण से जुड़े कार्यों में स्थानीय युवाओं की भागीदारी उन्हें अपने ही क्षेत्र में काम से जोड़ सकती है। सरकार का लक्ष्य इस योजना के माध्यम से हजारों ग्रामीण लोगों के लिए प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर पैदा करना है। इस दृष्टि से योजना का संदेश स्पष्ट है— हरियाली केवल पर्यावरण की जरूरत नहीं, ग्रामीण अर्थव्यवस्था का अवसर भी बन सकती है। इस योजना की सबसे बड़ी उपलब्धि इसकी सामुदायिक संरचना है। जब किसी जंगल की जिम्मेदारी किसी दूर बैठे कार्यालय के बजाय उसी गांव के लोगों के हाथों में होती है, तो उस जंगल के प्रति भावनात्मक जुड़ाव भी बढ़ता है। योजना में जियो-टैगिंग, डिजिटल निगरानी और इलेक्ट्रॉनिक भुगतान जैसी व्यवस्थाओं का प्रावधान किया गया है। इससे पौधरोपण कार्य की निगरानी, पारदर्शिता और जवाबदेही को मजबूत करने का प्रयास किया गया है। यह आधुनिक तकनीक और पारंपरिक सामुदायिक भागीदारी का ऐसा मेल है, जिसकी हिमाचल जैसे पहाड़ी राज्य को विशेष आवश्यकता है। आज लगाया गया पौधा तत्काल परिणाम नहीं देता। वह समय मांगता है। लेकिन यही प्रकृति का नियम है—पेड़ आज लगाए जाते हैं और उनकी छाया आने वाली पीढ़ियां पाती हैं। राजीव गांधी वन संवर्धन योजना इसलिए महज एक सरकारी योजना नहीं, बल्कि हिमाचल के भविष्य में किया जा रहा एक हरित निवेश है। इसकी सफलता का अर्थ केवल अधिक जंगल नहीं होगा। इसका अर्थ होगा—सुरक्षित पहाड़, संरक्षित जलस्रोत, मजबूत गांव, रोजगार से जुड़े युवा और नेतृत्व करती ग्रामीण महिलाएं। हिमाचल को यदि वास्तव में हरित और जलवायु-सक्षम राज्य बनाना है, तो जंगलों की रक्षा फाइलों से निकलकर गांवों तक पहुंचनी होगी। और जब गांव खुद जंगल के प्रहरी बन जाएं, तब हर लगाया गया पौधा सिर्फ एक पेड़ नहीं रहता— वह हिमाचल के भविष्य की एक जीवित उम्मीद बन जाता है। राजीव गांधी वन संवर्धन योजना की सबसे बड़ी ताकत पौधरोपण नहीं, बल्कि लोगों को प्रकृति से दोबारा जोड़ना है। यह योजना जंगल को सरकारी संपत्ति से सामुदायिक जिम्मेदारी में बदलने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयोग है। यदि पौधों की जीवित रहने की दर, रोजगार सृजन और सामुदायिक भागीदारी पर निरंतर निगरानी रखी गई, तो यह मॉडल हिमाचल के लिए ही नहीं, बल्कि अन्य पर्वतीय राज्यों के लिए भी एक अनुकरणीय उदाहरण बन सकता है।
लेखक: राजन कुमार शर्मा
गांव डुगली, उप तहसील लंबलू,

