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स्वस्थ समाज के लिए यौन-शिक्षा ज़रूरी: डॉ. शमा लोहुमी 

शिमला – प्रतिष्ठित नर्सिंग विशेषज्ञ डॉ. शमा लोहुमी ने कहा है कि युवा वर्ग मासिकधर्म और प्रजनन स्वास्थ्य के बारे में समाज में फैले अंधविश्वास को मिटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। मानवाधिकार संरक्षण पर उमंग फाउंडेशन के साप्ताहिक वेबीनार में उन्होंने कहा कि इससे महिलाओं का वास्तविक सशक्तिकरण होगा और पूरा समाज मजबूत बन सकेगा। उन्होंने 9 वीं कक्षा से बच्चों को सेक्स शिक्षा देने की आवश्यकता भी बताई।

उमंग फाउंडेशन की प्रवक्ता सवीना जहां ने बताया कि डॉ. शमा लोहुमी आजादी के अमृत महोत्सव के उपलक्ष में आयोजित छठे साप्ताहिक वेबीनार

बतौर मुख्य वक्ता बोल रही थीं। विषय था “महिलाओं का प्रजनन स्वास्थ्य एवं मासिक धर्म संबंधी स्वच्छता का अधिकार”। वह शिमला के शिवालिक इंस्टिट्यूट ऑफ़ नर्सिंग में प्रिंसिपल के पद पर कार्यरत हैं और न्यूजीलैंड के एक प्रतिष्ठित संस्थान में भी अतिथि प्रोफ़ेसर रह चुकी हैं।

उनका कहना था कि समाज में प्रजनन स्वास्थ्य और मासिक धर्म संबंधी स्वच्छता के बारे में अनेक प्रकार के अंधविश्वास प्रचलित हैं। युवाओं में वैज्ञानिक सोच विकसित करके इनका निवारण किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि प्रजनन स्वास्थ्य और मासिक धर्म संबंधी स्वच्छता एक मौलिक अधिकार है। इस पर समाज में खुलकर चर्चा होनी चाहिए।

छात्रों एवं छात्राओं को कक्षा 9 से ही यौन शिक्षा दी जानी चाहिए। इससे उनमें बचपन से ही वैज्ञानिक सोच विकसित होगी और महिलाओं के स्वस्थ होने पर संपूर्ण समाज की सेहत दुरुस्त रह पाएगी।

उन्होंने कहा कि परिवार, समाज और शिक्षण संस्थानों में इस विषय पर संवाद न होने के कारण अनेक प्रकार के अंधविश्वास पनपते रहते हैं। जिसका नतीजा है कि  महिलाओं को जीवन भर एनीमिया और अनेक बीमारियों का शिकार होकर जीना पड़ता है। इस संबंध में स्कूली लड़कियों से लेकर हर उम्र की महिलाओं और पुरुषों को भी जागरूक किया जाना चाहिए।

उमंग फाउंडेशन के प्रयासों की सराहना करते हुए उन्होंने कहा कि मानवाधिकार संरक्षण पर समझ विकसित करना समय की आवश्यकता है।

मानवाधिकार कार्यकर्ता एवं उमंग फाउंडेशन के अध्यक्ष प्रो. अजय श्रीवास्तव ने अंतरराष्ट्रीय संधियों, सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के निर्णयों का संदर्भ देकर बताया कि प्रजनन स्वास्थ्य एवं मासिक धर्म संबंधी स्वच्छता विश्व भर में मानवाधिकार के रूप में मान्यता प्राप्त है। लेकिन समाज की सड़ी गली सोच के कारण महिलाओं को प्रताड़ना झेलनी पड़ती है। गांव से लेकर शहरों तक उन्हें मासिक धर्म के दिनों में छुआछूत का सामना भी करना पड़ता है।
कार्यक्रम में हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय, विभिन्न महाविद्यालयों के विद्यार्थियों और एपीजी शिमला यूनिवर्सिटी के एनसीसी (आर्मी विंग) के कैडेटों समेत लगभग 100 युवाओं ने हिस्सा लिया। कार्यक्रम का संचालन हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय दिव्यांग शोध छात्राओं – इतिका चौहान, अंजना ठाकुर, सवीना जहाँ और शगुन चौहान ने किया।

Samagra Sikhsha

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