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फिल्मों में बच्चे व युवा सिर्फ पात्र नहीं

सहायक प्रो.प्यार सिंह ठाकुर
बल्कि कहानी बच्चों की हो, दुनिया उनकी हो, संवेदनाएँ उनकी हों, समस्याएं उनकी हों। आज इस तरह का बाल सिनेमा में कुछ खास नहीं हो रहा है। बाल सिनेमा में बच्चे व युवा मात्र पात्र नहीं बल्कि उनके लिए बाल सिनेमा सीखने का अवसर भी देता है और उनकी सोच को नई दिशा भी मिलती है ताकि वे बाल व युवा समाज को बेहतर कार्यों के लिए प्रेरित करे। बाल फिल्मों में उपदेश देने का भाव ज्यादा रहा है, बच्चों के मन को समझने का नहीं। हिंदी सिनेमा की विडंबना है कि जब बड़ों के लिए फिल्में बनती हैं तो उसका एकमात्र आधार एंटरटेनमेंट, एंटरटेनमेंट और एंटरटेनमेंट होता है, लेकिन जब बच्चों की फिल्मों की बारी आती है तो इस एंटरटेनमेंट को ही सबसे पहले बाहर रखने की कोशिश की जाती है। दरअसल हमारे यहां बच्चे को देखते ही बड़ों के मन में ख्याल आता है कि उसे उपदेश दे डालो, भले ही उस पर कोई असर पड़े या नहीं। सत्येन बोस की बहुप्रशंसित फिल्म ‘जागृति’, जिसे भारतीय बाल फिल्म के इतिहास में मील का पत्थर माना जाता है, बाल दर्शकों को नैतिकता का उपदेश देती है। इसकी थीम ही है बच्चे पर पांडित्यपूर्ण शैली में आचरण की बाध्यताएं लागू करना। बॉलिवुड के प्रतिष्ठित निर्देशकों ने भी जो फिल्में बनाई उनमें बच्चों को साथ लेकर चलने के बजाय मोटे-मोटे संदेश ठूंसे जाते रहे। यह आदर्शवाद कई फिल्मों में इतना भारी पड़ जाता था कि समझना मुश्किल था, बच्चे इतना सद्ज्ञान लेकर करेंगे क्या? आज स्थितियां जरूर बदली हैं पर बच्चों को लेकर समाज में कायम मानसिकता कमोबेश वैसी ही है। जैसे, ‘तारे जमीन पर’ और ‘राहुल’ कहने को तो बाल फिल्में हैं, लेकिन ये बच्चों से ज्यादा अभिभावकों को संबोधित लगती हैं। ‘तारे जमीन पर’ में शिक्षक ही हमारे जेहन में अटकता है। लगता है, उसे ही स्थापित करने के लिए बच्चे की कहानी सुनाई जा रही है। वे दिन गए, जब घरों में बच्चे सिनेमा देखने के लिए डांट सुना करते थे। फिल्म आज हमारी दिनचर्या में शामिल है। जिस तरह वयस्कों की इंटरनेट साइट से बच्चों को बचाने की कोशिशें आज हमारी प्राथमिकता में शामिल हो गई हैं, उसी तरह दिन ब दिन वयस्क और हिंसक होते जा रहे हिंदी सिनेमा के खतरों को भी हमें महसूस करना होगा। सच तो यह है कि हिंदी में ‘मासूम’ की नहीं, ईरानी फिल्म ‘चिल्ड्रेन ऑफ हैवन’ की जरूरत है जो बाल मन के अंदर प्रवेश का अवसर देती है। आखिर कहीं न कहीं हम ही तो दोषी हैं कि ‘स्वामी’ जैसी फिल्म दोबारा बनाने की हिम्मत कोई फिल्मकार नहीं जुटा पाता। बच्चों के नाम पर आज हनुमान, गणेश, घटोत्कच जैसे चरित्रों पर फिर से फिल्में बन रही हैं। ‘फिर से’ का अर्थ यह कि भारत में सिनेमा की नींव ही इन्हीं विषयों पर रखी गई थी। दादा साहब फालके की बनाई 125 फिल्मों के दायरे से शायद ही कोई पुराण कथा बची हो। आश्चर्य है कि बच्चों के लिए विषय की तलाश में हमें मिथक खंगालने पड़ रहे हैं। जाहिर है, बच्चे भी इन्हें बहुत स्वीकार नहीं कर पा रहे। हमारे बड़े होते बच्चों के लिए जरूरी है कि कुछ फिल्में ऐसी बनें जिनमें ‘वे’ भी दिखें, उनकी संवेदना भी, उनकी कमजोरियां भी। कनाडा के बाल फिल्म विशेषज्ञ रॉबर्ट रॉय ने बाल फिल्म को परिभाषित करते हुए कहा था, ‘वह फिल्म जिसमें बच्चा खुद को एकात्म महसूस करे। फिल्मों के माध्यम से हमें अपने विचार लादने के बजाय बच्चे को स्वतः अपनी राय कायम करने के लिए स्वतंत्र छोड़ देना चाहिए।’ नागेश कुकनूर ने सुभाष घई के लिए ‘इकबाल’ के रूप में यह कोशिश की थी। परिवार, रिश्ते, समर्पण, संघर्ष की यह कथा बच्चों को सीधे संबोधित नहीं होती, उनके सामने एक स्थिति रखती है और उन्हें सोचने के लिए बाध्य करती है। विशाल भारद्वाज ने ‘मकड़ी’ बनाकर बाल सिनेमा की एक नई जमीन तैयार करने की कोशिश की। फिर कुछ समय बाद उन्होंने बच्चों के लिए ‘ब्लू अंब्रेला’ भी बनाई। व्यावसायिक कुशलता के साथ बच्चों पर केंद्रित फिल्म बनाने की यह सराहनीय शुरुआत थी। हाल के दिनों में जब एकल परिवार में बच्चों की इच्छाओं का दबाव बढ़ता जा रहा है और वे बाजार में अपना हस्तक्षेप जाहिर करने की स्थिति में आ गए हैं, तब फिल्मकार भी उनकी इच्छा का सम्मान करते हुए आगे आ रहे हैं। ‘हवा हवाई’, ‘चिल्लर पार्टी’,’स्टेनली का डब्बा’, ‘आई एम कलाम’ और ‘गट्टू’ जैसी बच्चों से बच्चों की भाषा में संवाद करती कुछ फिल्में भी आईं, लेकिन हर साल 800 से भी ज्यादा फिल्में बनाने वाले मुल्क में यह संख्या कतई संतोषजनक नहीं मानी जा सकती। रस्म अदायगी या प्रयोग के नाम पर कुछ बाल फिल्मों का बनना काफी नहीं है। जरूरत लगातार ऐसी फिल्में बनाने की है, जो बच्चों को बड़ों के सिनेमा से दूर ले जा सकें, जैसा ‘डोरेमोन’ और ‘सिनचैन’ जैसे जापानी कार्टूनों ने किया है। दुर्भाग्य से बाल फिल्मों को बढ़ावा देने के लिए बनी संस्था ‘बाल चित्र समिति’ ने इस मामले में कुछ खास नहीं किया। इसके अधिकारियों ने अपना ज्यादा समय राजनीतिक आकाओं की दिलजोई में लगाया।
यदि हम भविष्य के लिए चिंतित हैं तो बच्चों के लिए चिंतित होना होगा। और बच्चों की फिक्र है तो बाल सिनेमा के लिए परेशान होना होगा। बाल सिनेमा यानी ऐसी फिल्में, जिनमें ‘एक छोटी सी लव स्टोरी’ की तरह बच्चे सिर्फ पात्र भर नहीं हों। कहानी बच्चों की हो, दुनिया उनकी हो, समस्याएं उनकी हो, जहां बच्चे लड़ते-भिड़ते, गलतियां करते आगे बढ़ना सीख रहे हों- जैसा बांग्ला में सत्यजीत रे की फिल्मों में होता था।
गेयटी थिएटर शिमला में 16 से 18 अगस्त तक आयोजित होने वाले तीन दिवसीय दसवें अंतराष्ट्रीय फिल्म समारोह शिमला में युवाओं व बच्चों के लिए विशेष स्क्रीनिंग और इंटरैक्टिव सत्रों का आयोजन ‘बचपन ‘ थीम के तहत किया जा रहा है। ये स्क्रीनिंग गोथिक थिएटर में होंगी जो केवल बच्चों के लिए समर्पित होगी। इस दिशा में बच्चे व युवाओं के लिए शिमला के अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में फिल्म निर्माण पर इंटरैक्टिव सत्र से युवाओं व बच्चों के लिए सीखने का अवसर मिल रहा है। अंतराष्ट्रीय फिल्म समारोह शिमला में विशेष रूप से बच्चों के लिए एक विविध और समृद्ध कार्यक्रम तैयार किया गया है, जिसमें विभिन्न शैलियों, संस्कृतियों और विषयों पर आधारित लघु, वृत्तचित्र, एनीमेशन और फीचर फिल्में शामिल हैं। इन फिल्मों को न केवल मनोरंजन के लिए बल्कि युवा दर्शकों को शिक्षित और प्रेरित करने के लिए भी स्क्रीन किया जा रहा है ।स्क्रीनिंग के अलावा, अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह शिमला बच्चों को फिल्म निर्माताओं से सीधे जुड़ने का एक अनूठा अवसर प्रदान कर रहा है। ये इंटरैक्टिव सत्र युवा दर्शकों को फिल्म निर्माण प्रक्रिया में गहराई से उतरने, सवाल पूछने और उन लोगों से अंतर्दृष्टि प्राप्त करने का अवसर देंगे जो उनकी पसंदीदा फिल्में बनाते हैं।
कहानी कहने की शैलियों और सांस्कृतिक दृष्टिकोणों की एक विस्तृत श्रृंखला को प्रदर्शित करके, महोत्सव का उद्देश्य अपने युवा दर्शकों के बेहतरीन क्रिएटिव फिल्म दिखाना और फिल्म के बारीकियों से रूबरू करना है। शिमला के बच्चों के लिए ये अनूठा आयोजन है क्यूंकि इस तरह के फिल्म महोत्सव में युवाओं व बच्चों के लिए बनी फिल्मों की स्क्रीनिंग केवल मेट्रो शहरों तक ही सिमित होती हैं। शिमला में ऐसा आयोजन युवाओं व बच्चों के लिए एक मौका भी है कि वो इस फिल्म महोत्सव का पूरा लाभ उठाएं। 16 से 18 अगस्त 2024 को सुबह 10 बजे से शाम 7 बजे तक थिएटर में इन विशेष स्क्रीनिंग की मेजबानी करेगा। स्क्रीनिंग के अलावा, अंतराष्ट्रीय फिल्म समारोह शिमला बच्चों को फिल्म निर्माताओं से सीधे जुड़ने का एक अनूठा अवसर प्रदान कर रहा है। ये इंटरैक्टिव सत्र युवा दर्शकों को फिल्म निर्माण प्रक्रिया में गहराई से उतरने, सवाल पूछने और उन लोगों से अंतर्दृष्टि प्राप्त करने का अवसर देंगे जो उनकी पसंदीदा फिल्में बनाते हैं। फिल्म निर्माताओं और बच्चों के बीच सीधे संवाद को बढ़ावा देकर, महोत्सव का उद्देश्य फिल्म निर्माण की कला को बेहतरीन बनाना और कहानीकारों की भावी पीढ़ियों को प्रोत्साहित करना है। बच्चों को फिल्म निर्माण प्रक्रिया की गहन समझ प्रदान की जायेगी।
शिमला के अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में युवाओं व बच्चों के लिए यह विशेष कार्यक्रम ‘बचपन’ पेश करते हुए हमें बहुत खुशी हो रही है।हमारा लक्ष्य एक ऐसा मंच तैयार करना है, जहां युवा सिनेमा की दुनिया को एक्सप्लोर कर सकें, उद्योग के विशेषज्ञों से सीख सकें और अपनी कहानियां कहने के लिए प्रेरित हो सकें।” इस वर्ष 27 देश और 20 राज्य इस प्रतिष्ठित अन्तराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव शिमला में भाग ले रहे हैं, जो विविध संस्कृतियों और दृष्टिकोणों के माध्यम से की फिल्मों की के माध्यम से अपनी कहानी कहेंगे ।
अंतर्राष्ट्रीय श्रेणी में संयुक्त राज्य अमेरिका, बेल्जियम, ईरान, कनाडा, चीन, चेक गणराज्य, तुर्की, नेपाल, मिस्र, बांग्लादेश, इटली, पोलैंड, अर्जेंटीना, स्वीडन, अफगानिस्तान, ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस और दुबई के फिल्म निर्माता भाग ले रहे हैं। जबकि भारत से बीस राज्य भाग ले रहे हैं, केरल, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, राजस्थान, मणिपुर, असम, दिल्ली, पंजाब, पश्चिम बंगाल, कश्मीर, उत्तराखंड, उड़ीसा, झारखंड, छत्तीसगढ़, दिल्ली, गुजरात, कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश की फिल्मों की स्क्रीनिंग होगी ।
इस महोत्सव में अंतर्राष्ट्रीय, राष्ट्रीय और राज्य तीन श्रेणी की प्रतियोगिताएं होंगी। समसामयिक मुद्दों, विषयों, देशों और फिल्म निर्माताओं के कार्यों पर ध्यान केंद्रित करने वाले विशेष रूप से क्यूरेटेड सत्र भी होंगे। कार्यक्रम में फिल्मों की स्क्रीनिंग, फिल्म संस्थानों के विशेषज्ञों, फिल्म समीक्षकों और फिल्म उद्योगों के साथ सेमिनार/कार्यशाला सत्र भी शामिल होंगे। 60 स्वतंत्र फिल्म निर्देशक जिनकी फिल्में महोत्सव में दिखाई जाएंगी, वे भी तीन दिवसीय महोत्सव की शोभा बढ़ाएंगे और दर्शकों से रूबरू होंगे।
अंतराष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव शिमला (आईएफएफएस) का उद्देश्य विश्वभर से बेहतरीन वृत्तचित्र, लघु फिल्म, फीचर फिल्म, एनीमेशन फिल्म और संगीत वीडियो और वेब श्रृंखला को शिमला के दर्शकों को उनके शहर में लाना है बढ़ाना है। आईएफएफएस 2015 से सफलतापूर्वक आयोजित किया जा रहा है, इस महोत्सव का पहला संस्करण 2015 में आयोजित किया गया था।
शिमला के अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव का महोत्सव का आयोजन हिमालयन वेलोसिटी द्वारा सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार, भाषा एवं संस्कृति विभाग (एलएसी) के सहयोग से किया जा रहा है। शिमला का अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव भारत के प्रमुख फिल्म महोत्सवों में से एक है, जो राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय सिनेमा को एक मंच पर लाकर उन्हें अवसर प्रदान करता है।

Samagra Sikhsha

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